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वाइन व्यवसाय : ‘अंगूर की बेटी’ की असलियत


वाइन व्यवसाय : ‘अंगूर की बेटी’ की असलियत


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   महाराष्ट्र के नासिक ज़िले की सह्याद्रि पहाड़ियों में फैले ‘वाइन यार्ड’ आज एक ऐसे पर्यटन मॉडल का प्रतीक बन चुके हैं, जिसे आकर्षक शब्दों में ‘वाइन टूरिज़्म’ कहा जाता है। चमकदार ब्रांडिंग, दूर-दूर तक फैले अंगूर के बागान, टेस्टिंग रूम, कैफे, संगीत, खुले लॉन और फ़ोटो-स्पॉट – यह पूरा परिदृश्य किसी सामान्य पारिवारिक सैरगाह जैसा प्रतीत होता है, लेकिन इस आकर्षक दृश्य के पीछे एक चिंताजनक सामाजिक-सांस्कृतिक तथा पर्यावरणीय कहानी छिपी है, जिसे पर्यटन के उत्साह में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

   पिछले दिनों हमें उस ‘सूला वाइन यार्ड्स’ का भ्रमण करने का अवसर मिला जिसे ‘वाइन पर्यटन’ का अग्रदूत माना जाता है। यहां आने वाले पर्यटक वाइन बनाने की प्रक्रिया देखने के साथ-साथ उसे चखते हैं, स्वाद लेते हैं, बोतलें खरीदते हैं और तथाकथित ‘लाइफ़ स्टाइल अनुभव’ का हिस्सा बनते हैं। यही मॉडल अब नासिक और आसपास के क्षेत्रों में अन्य वाइन ब्रांड्स द्वारा भी अपनाया जा रहा है। उनमें ‘सोमा वाइन विलेज,’ ‘यॉर्क वाइनरी,’ ‘ग्रोवर ज़म्पा वाइन यार्ड्स,’ ‘शैन्डन इंडिया,’ ‘चंदन भारत,’ ‘फ्रेटेली वाइन,’ ‘वैलोनवाइन यार्ड्स,’ ‘इंडेजवाइन यार्ड्स’ आदि उल्लेखनीय हैं। इन सभी परिसरों में शराब को केवल एक उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिकता, आनंद और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

‘वाइन पर्यटन’ या उपभोग का उत्सव?

   यूं तो पर्यटन का उद्देश्य किसी स्थान की संस्कृति, प्रकृति, इतिहास और वहां के लोगों से जुड़ना होता है, लेकिन ‘वाइन पर्यटन’ का मौजूदा स्वरूप इससे अलग दिशा में जाता दिखता है। यहां स्थानीय ग्रामीण जीवन, किसानों की वास्तविक परिस्थितियां और क्षेत्र की पारंपरिक संस्कृति हाशिये पर चली जाती है। केंद्र में रहता है ब्रांड, बाज़ार और प्रदर्शन। यह ऐसा पर्यटन है, जिसमें आनंद उपभोग से तय होता है। भारतीय समाज की सामूहिकता, सादगी और संयम की परंपरा इस मॉडल से सीधे टकराती है।

नासिक को भारत की ‘वाइन कैपिटल’ कहा जाता है। अनुकूल जलवायु, सह्याद्रि की ढलानें और दशकों से विकसित अंगूर की खेती ने यहां वाइन उद्योग को तेज़ी से पनपने का अवसर दिया है। अनुमान है कि भारत में लगभग 70–80 वाइनरी हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत से अधिक महाराष्ट्र में हैं और इनका बड़ा हिस्सा नासिक क्षेत्र में केंद्रित है। नासिक, सांगली, सोलापुर (आकलूज) और पुणे जैसे इलाकों को मिलाकर लगभग 45–50 वाइनरी सक्रिय या अर्ध-सक्रिय मानी जाती हैं। सरकारी नीतियां, निर्यात की संभावनाएं और पर्यटन इस विस्तार को लगातार गति दे रहे हैं, लेकिन यह विस्तार केवल आर्थिक अवसर नहीं लाता; इसके साथ सामाजिक और पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ते हैं।

   भारत विश्व के प्रमुख अंगूर उत्पादक देशों में शामिल है। देश में हर वर्ष लगभग 30–32 लाख टन अंगूर का उत्पादन होता है, जिसमें 55–60 प्रतिशत हिस्सेदारी महाराष्ट्र की है। नासिक अकेले भारत के कुल अंगूर उत्पादन का लगभग एक तिहाई – करीब 9–11 लाख टन – पैदा करता है। यह उत्पादन लगभग 1.4 – 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैली खेती से आता है। नासिक के अंगूर तीन प्रमुख तरीकों से उपयोग किए जाते हैं – ताज़ा फल के रूप में घरेलू बाज़ार, यूरोप और मध्य-पूर्व के लिए निर्यात और वाइन उद्योग के लिए कच्चा माल। वाइन में उपयोग होने वाला अंगूर मात्रा में भले ही कुल उत्पादन का 8–12 प्रतिशत हो, लेकिन जल, भूमि और रसायनों की खपत के लिहाज़ से इसका प्रभाव कहीं अधिक है।

   अंगूर की खेती में खूब पानी लगता है। ड्रिप सिंचाई के बावजूद एक हेक्टेयर अंगूर के लिए एक मौसम में औसतन 50–60 लाख लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। एक लीटर वाइन के उत्पादन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 600–650 लीटर पानी का उपयोग होता है। नासिक जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्र में यह मांग सीधे भूजल दोहन को बढ़ाती है। पिछले वर्षों में कई इलाकों का भूजल स्तर 10–20 मीटर से गिरकर 25–40 मीटर या उससे भी नीचे चला गया है। इसका सीधा असर छोटे, सीमांत किसानों तथा ग्रामीण पेयजल पर पड़ता है, जबकि बड़ी वाइन कंपनियां पानी पर पकड बनाए रखती हैं। अंगूर उत्पादन केवल कृषि विकास का आंकड़ा भर नहीं रह जाता, बल्कि वह जल-संकट, भूजल दोहन और कृषि नीति की बहस के केंद्र में आ जाता है।

   वाइन उद्योग ने भूमि उपयोग के स्वरूप को भी बदला है। मिश्रित खेती और जैव-विविधता वाली ज़मीनें एक-रूपी अंगूर बागानों में बदल रही हैं। अंगूर की व्यावसायिक खेती में कीटनाशकों और फफूंद नाशकों का नियमित प्रयोग होता है, जिससे मिट्टी और भूजल में रासायनिक अवशेषों का खतरा बढ़ता है। किण्वन, सफ़ाई और बोतलबंदी से निकलने वाला अपशिष्ट जल यदि पूरी तरह शुद्ध न किया जाए, तो आसपास के खेतों और जलस्रोतों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।

बदलती सामाजिक चेतना

भारतीय समाज में लंबे समय तक शराब को सीमित, निजी और कई बार वर्जित व्यवहार के रूप में देखा गया, लेकिन ‘वाइन पर्यटन’ इस दृष्टि को बदल रहा है। खुले, सुंदर और उत्सवी माहौल में मद्य-सेवन उसे सामान्य और स्वीकार्य बनाता है। शराब को ‘सभ्य’, ‘सुरक्षित’ और ‘फ़ैमिली-फ्रेंडली’ बताकर प्रस्तुत करना उपभोक्तावादी संस्कृति की सुनियोजित रणनीति है, जिसमें बाज़ार यह तय करता है कि आधुनिकता का अर्थ क्या होगा। इस मॉडल का मुख्य लक्ष्य शहरी मध्यम वर्ग है जो अनुभव-आधारित उपभोग, स्टेटस और आधुनिकता की आकांक्षाओं से संचालित होता है। सप्ताहांतों और छुट्टियों में हजारों परिवारों और बच्चों की मौजूदगी इस मॉडल को वैधता देती है और शराब को ‘सामान्य पारिवारिक अनुभव’ के रूप में स्थापित करती है।

   वाइन परिसरों में सबसे चिंताजनक दृश्य बच्चों की निर्बाध मौजूदगी है। छोटे बच्चे अपने माता-पिता और अन्य वयस्कों को वाइन-टेस्टिंग करते, बोतलें खरीदते और शराब को उत्सव से जोड़ते देखते हैं। बचपन में देखे गए अनुभव ही मूल्यबोध की नींव रखते हैं। इस तरह शराब एक प्रकार के सांस्कृतिक प्रशिक्षण का हिस्सा बन जाती है, जिसका प्रभाव आने वाले दशकों में दिखाई देगा। यह केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का मुद्दा है।

   सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि राज्य, प्रशासन और समाज इस बदलाव को मौन स्वीकृति दे रहे हैं। राजस्व और पर्यटन के नाम पर शराब-केंद्रित स्थलों को बढ़ावा देना आसान विकल्प बन गया है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य, सांस्कृतिक संतुलन और बच्चों पर पड़ने वाले प्रभावों पर गंभीर बहस लगभग अनुपस्थित है। यह चुप्पी ही सबसे बड़ा संकट है, क्योंकि सामाजिक मूल्य बिना किसी सार्वजनिक संवाद के बदलते चले जाते हैं। असल सवाल यह है कि हम किस तरह का समाज गढ़ रहे हैं? क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को यह सिखाना चाहते हैं कि आनंद, आधुनिकता और सामाजिक स्वीकृति का रास्ता मद्यपान से होकर गुजरता है? यदि वाइन पर्यटन को रोका नहीं जा सकता, तो यह मायावी पर्यटन भारतीय समाज को धीरे-धीरे उपभोग-प्रधान और संवेदनहीन संस्कृति की ओर धकेल देगा, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। (सप्रेस)


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